पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए (NDA) की प्रचंड जीत के बीच चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक धमक दिखाई है। 29 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली लोजपा (आर) का स्ट्राइक रेट 65% से अधिक रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज की यह सफलता 2020 में लिए गए उस साहसी फैसले की नींव पर टिकी है, जब चिराग ने अकेले चुनाव मैदान में उतरने का जोखिम उठाया था।
2020 का वह फैसला, जिसने बदली किस्मत
2020 के चुनाव में चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा था। हालांकि तब पार्टी को महज 1 सीट मिली थी, लेकिन 6 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर चिराग ने खुद को बिहार की राजनीति में एक अनिवार्य चेहरा बना दिया था। उस वक्त जेडीयू (JDU) को हुए नुकसान ने चिराग को एक ‘स्वतंत्र और दमदार’ नेता के रूप में स्थापित किया।
रणनीति के पीछे ‘सौरभ पांडेय’ का विजन
इस पूरी राजनीतिक बिसात को बिछाने में चिराग के करीबी सहयोगी सौरभ पांडेय की भूमिका बेहद अहम रही। सौरभ ने न केवल उम्मीदवारों का चयन किया, बल्कि “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” जैसा प्रभावशाली नारा और विजन डॉक्यूमेंट तैयार किया।
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विवाद और विजन: उस दौरान चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस ने सौरभ पर पार्टी को गुमराह करने के आरोप लगाए थे।
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सौरभ का पक्ष: इन आरोपों पर सौरभ पांडेय का कहना था कि यह रामविलास पासवान जी की ही इच्छा थी कि चिराग एक मजबूत और स्वतंत्र नेता के रूप में उभरें। 2020 का वह कठिन फैसला इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी था।
जोखिम से मिली ‘स्वतंत्र पहचान’
विवादों के बाद सौरभ ने खुद को पार्टी के आधिकारिक कार्यों से दूर कर लिया था, लेकिन 2025 के परिणामों ने साबित कर दिया कि 2020 में बोए गए बीज अब फल दे रहे हैं।
“बड़े लक्ष्यों के लिए बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। कुछ का फल तुरंत मिलता है, कुछ का बाद में। 2025 का यह परिणाम 2020 के उस साहसी फैसले की जीत है। यह चिराग पासवान की मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति का नतीजा है।” — सौरभ पांडेय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि चिराग ने 2020 में वह जोखिम न लिया होता, तो आज लोजपा (आर) के पास न तो इतनी सीटें होतीं और न ही बिहार की राजनीति में इतना मजबूत मोलभाव (Bargaining Power) करने की ताकत।








